10,000 FPO, लाखों SHG — लेकिन किसान का मुनाफा कहाँ है?


10,000 FPO, लाखों SHG — लेकिन किसान का मुनाफा कहाँ है?


भारत ने संस्थाएँ तो बना दीं, अब साबित करना होगा कि ये संस्थाएँ आय भी बढ़ा सकती हैं_


 ई. प्रकाश पाण्डेय, संस्थापक, तेजस्वी संगठन न्यास | संपादकीय - ग्रामीण अर्थव्यवस्था*


6,865 करोड़ रुपये की FPO योजना, SHG को भारी मात्रा में ऋण और वर्षों का मार्गदर्शन — इन सबने एक विशाल संस्थागत नेटवर्क जरूर खड़ा किया है। लेकिन असली रिपोर्ट कार्ड पंजीकरण, बैठकों या प्रशिक्षणों की संख्या नहीं है। असली रिपोर्ट कार्ड है - किसान और ग्रामीण महिलाओं तक वास्तव में कितनी आय पहुँची?


 नई दिल्ली: भारत के ग्रामीण विकास ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। किसानों को संगठित किया गया, ग्रामीण महिलाओं को समूहों में जोड़ा गया, संस्थाएँ बनीं, ऋण का विस्तार हुआ और सरकारी सहायता अभूतपूर्व स्तर पर गाँवों तक पहुँची।


लेकिन अब एक असहज सवाल से बचना संभव नहीं है - क्या संस्थाओं का निर्माण वास्तव में आय निर्माण में बदल पाया है?


सरकार की महत्वाकांक्षी 10,000 किसान उत्पादक संगठनों (FPO) की योजना का कुल बजट 6,865 करोड़ रुपये है। अगस्त 2026 तक सरकार ने बताया कि 10,000 FPO के गठन का लक्ष्य पूरा हो चुका है और 31 जुलाई 2026 तक इनका संचयी कारोबार 20,358 करोड़ रुपये रहा।


कागज पर ये आँकड़े प्रभावशाली हैं, लेकिन अगला सवाल यही होना चाहिए कि इस आर्थिक गतिविधि का कितना हिस्सा वास्तव में किसानों की स्थायी आय में बदला?


पंजीकरण व्यवसाय नहीं है

FPO का सरकारी डेटाबेस में पंजीकृत हो जाना उसे सफल व्यवसाय नहीं बनाता। किसान का शेयरधारक बन जाना यह सुनिश्चित नहीं करता कि वह नियमित रूप से FPO को अपना उत्पाद बेच रहा है।


प्रशिक्षण हो सकता है, व्यवसाय योजना बन सकती है, बैंक खाता खुल सकता है, ऋण स्वीकृत हो सकता है, बाजार से जुड़ाव रिपोर्ट में दर्ज हो सकता है। लेकिन इनमें से कोई भी बात अकेले यह प्रमाणित नहीं करती कि किसान आर्थिक रूप से मजबूत हुआ है।


गठन एक प्रशासनिक उपलब्धि है, व्यवसाय एक आर्थिक उपलब्धि है।

एक वास्तविक FPO को अंततः यह कहने में सक्षम होना चाहिए - "हमने अपने किसानों से खरीद की, मूल्य जोड़ा, खरीदार खोजे, उत्पाद बेचा, लाभ कमाया और किसानों को समय पर बेहतर भुगतान किया।"


25 लाख रुपये का सवाल

FPO योजना के तहत गठन एवं ऊष्मायन सहायता के रूप में पाँच वर्षों में प्रति FPO 25 लाख रुपये तक की सहायता दी जा सकती है, जिसमें CBBO का पेशेवर मार्गदर्शन भी शामिल है।


उद्देश्य स्पष्ट है - किसानों को संगठित करना, संस्थाओं को पेशेवर सहायता देना, निदेशकों को प्रशिक्षित करना।


लेकिन पाँच साल बाद सवाल यह नहीं होना चाहिए कि "क्या मार्गदर्शन दिया गया?" सवाल यह होना चाहिए कि "मार्गदर्शन के बाद क्या FPO अपने पैरों पर खड़ा हो सकता है?"


क्या वह खरीद-बिक्री कर सकता है? बाजार में मोलभाव कर सकता है? कार्यशील पूंजी संभाल सकता है? क्या वह बिना सरकारी सहायता के टिक सकता है और किसानों की आय बढ़ा सकता है? यही वास्तविक परीक्षा है।


ग्रामीण विकास का सबसे बड़ा विरोधाभास

गिनना आसान है - बैठकें, प्रशिक्षण, पंजीकरण, सदस्य, बैंक खाते, ऋण, प्रमाणपत्र, फोटो, रिपोर्ट।


गिनना कठिन है - शुद्ध लाभ, दोबारा आने वाले ग्राहक, किसान को मिला वास्तविक मूल्य, महिलाओं की व्यक्तिगत आय, व्यवसाय का टिके रहना और समय पर भुगतान।


ग्रामीण विकास के अगले सुधार की शुरुआत यहीं से होनी चाहिए।


रिपोर्ट कह सकती है "प्रशिक्षण पूरा हुआ", महिला पूछेगी "मेरा उत्पाद खरीदेगा कौन?"*

दीनदयाल अंत्योदय योजना - राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत लगभग 92 लाख स्वयं सहायता समूह (SHG) करीब 10.05 करोड़ ग्रामीण परिवारों/महिलाओं को जोड़ते हैं। संस्थागत ऋण का विस्तार भी ऐतिहासिक स्तर पर हुआ है।


यह सामाजिक संगठन की बड़ी उपलब्धि है, लेकिन ऋण एक साधन है, आय परिणाम है। ऋण मिल जाने से कोई महिला सफल उद्यमी नहीं बन जाती। उसे अभी भी कच्चा माल, प्रसंस्करण सुविधा, गुणवत्ता नियंत्रण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग, कार्यशील पूंजी, परिवहन और सबसे जरूरी - बाजार की जरूरत होती है।


गाँव उत्पादन कर सकता है, लेकिन खरीदेगा कौन? यही वास्तविक संघर्ष है।


सबसे महंगा शब्द - "पूर्ण"

प्रशिक्षण एक दिन में पूरा हो सकता है, स्थायी उद्यम बनाने में वर्षों लगते हैं। बैठक से कार्यवृत्त बनता है, व्यवसाय को नकदी प्रवाह पैदा करना पड़ता है। ऋण कर्ज पैदा कर सकता है, उद्यम को आय पैदा करनी पड़ती है।


इसलिए ग्रामीण विकास को अब नई भाषा चाहिए:

गठन नहीं - सक्रिय संचालन

प्रशिक्षण नहीं - वास्तविक क्षमता

ऋण नहीं - उद्यम

कारोबार नहीं - लाभ

बाजार से जुड़ाव नहीं - वास्तविक बिक्री


*सबसे बड़ी कमी - बाजार*


FPO और SHG दोनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती उत्पाद को बाजार में बदलना है। एक सफल ग्रामीण मूल्य श्रृंखला ऐसी होनी चाहिए:


किसान + SHG → संग्रह एवं एकत्रीकरण → FPC/FPO → गुणवत्ता नियंत्रण → प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन → ब्रांडिंग एवं पैकेजिंग → जिला/थोक बाजार → खुदरा/संस्थागत खरीदार → उपभोक्ता → भुगतान → किसान एवं महिलाओं की आय


यहीं से ग्रामीण विकास वास्तविक आर्थिक व्यवस्था बनेगा।


*FPC और SHG को साझेदार बनना होगा*


FPC/FPO की भूमिका - किसान एकत्रीकरण, खरीद, गुणवत्ता नियंत्रण, भंडारण और व्यवसाय प्रबंधन।

SHG की भूमिका - प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन, पैकेजिंग और महिला-नेतृत्व वाले उद्यम।

बाजार नेटवर्क की भूमिका - वितरण, खुदरा और उपभोक्ता तक पहुँच।


इनको जोड़कर "गाँव से उपभोक्ता तक" एक पूर्ण ग्रामीण बिजनेस नेटवर्क बनाया जा सकता है।


*नई रिपोर्ट कार्ड - अब हिसाब रुपये में होना चाहिए*


अब सवाल बदलना होगा। "कितने FPO बनाए गए?" नहीं, "कितने FPO वास्तविक व्यवसाय कर रहे हैं?" पूछना होगा। "कितने SHG को ऋण मिला?" नहीं, "कितनी SHG महिलाओं की स्थायी आय बनी?" पूछना होगा।


*निचोड़*


10,000 FPO एक उपलब्धि हैं, लाखों SHG एक उपलब्धि हैं। लेकिन अंतिम उपलब्धि तब होगी जब किसान कह सके - *"मेरे FPO ने मेरी आय बढ़ाई है"* और ग्रामीण महिला कह सके - *"मेरा SHG उद्यम मुझे स्थायी आय देता है।"*


तब तक काम पूरा नहीं हुआ है। संस्था बनाना शुरुआत है, मंजिल नहीं। ग्रामीण विकास का वास्तविक रिपोर्ट कार्ड फाइल में नहीं, किसान की आय में दिखना चाहिए।

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